Header Ads

https://www.blogger.com/u/2/blog/post/edit/6533186246000115294/2864025953938319402

सिक्योरिटी सिस्टम : Security System

एक प्राइवेट स्कूल की कक्षा 10वीं के दो छात्र भोजन अंतराल में किसी मामूली बात को लेकर आपस में  लड़ने लगे | उस समय कक्षा कक्ष में वह दोनों अकेले थे | बात बढ़ते-बढ़ते हाथापाई की नौबत आ गई | लेकिन प्रिंसिपल ऑफिस में प्रधानाध्यपक ने उन्हें लड़ते हुए सीसीटीवी कैमरे से देख लिए और तुरंत कक्षा में पहुंच कर दोनों को लड़ने से रोका| यह लड़ाई किसी भयानक हादसे का रूप ले सकती थी लेकिन तकनिकी संसाधनों के उपयोग से इसे रोक लिया गया| 

यह खाली एक उदाहरण नहीं ऐसे कई उदाहरण है जहां सीसीटीवी की मदद से अपराधों को घटित होने से पहले रोका गया है या घटित होने के बाद सीसीटीवी की मदद से अपराधियों को पहचानकर पकड़ा जा चुका है | आज सभी बड़े संस्थानों में, बैंकों में, अस्पतालों में, पैट्रोल पम्प पर, सरकारी - गैरसरकारी कार्यालयों में,  ट्रैफिक सिग्नलों और चौराहों पर ही नहीं लोगों ने अनजान खतरों से बचने के लिए घरों और दुकानों पर भी इन कैमरों को लगवाना शुरू कर दिया है, जिसका सकारात्मक परिणाम भी मिलता है| एक सर्वे के अनुसार सीसीटीवी से निगरानी वाली जगह पर बगैर निगरानी वाली जगह पर अधिक आपराधिक घटनाएं होती है | 

डिजिटल सिक्योरिटी सिस्टम में सिर्फ सीसीटीवी नहीं बल्कि और भी दूसरे टूल्स आते हैं तो आइये देखते हैं वह कौन-कौन उपकरण है जो आपकी सुरक्षा करते हैं |  

सीसीटीवी सिस्टम : सीसीटीवी का पूरा नाम क्लोज सर्किट टेलीविजन है|  सीसीटीवी कैमरे का इतिहास देखें तो पता चलता है कि इसका सबसे पहला उपयोग जर्मनी में 1942 में हुआ था, तब से यह सिक्योरिटी सिस्टम लगातार अपडेट हो रहा है|  सीसीटीवी सिस्टम को मुख्यरूप से तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है 1) कैमरा : जिसका काम है फुटेज कैप्चर करना, 2) रिकार्डिंग यूनिट : जिसमें डीवीआर बॉक्स होता है यह एक स्टोरेज सिस्टम की तरह काम करता है, जो फुटेज को सेव कर लेता है, इसका पूरा नाम है डिजिटल वीडियो रिकार्डर| आजकल आज मार्केट एनवीआर सिस्टम का भी चलन है, जिसका फुलफार्म होता है नेटवर्क वीडियो रिकार्डर और जैसा नाम से ही पता चल रहा है ये नेटवर्क के माध्यम से फुटेज को दूसरे स्टोरेज डिवाइस तक पहुंचाता है, 3) मॉनिटर : यह तीसरा हिस्सा है जिसमें हम कैमरे की करंट रिकार्डिंग या स्टोरेज में सुरक्षित रिकार्डिंग को देख सकते हैं| 

अभी कई तरह के सीसीटीवी कैमरा चलन में हैं जैसे बुलेट कैमरा, डोम कैमरा, इंफ्रारेड कैमरा, डे-नाइट कैमरा, पीटीजेड कैमरा, आईपी कैमरा, एनालॉग कैमरा आदि| सबकी अपनी-अपनी खासियत और उपयोग है|  वैसे तो सीसीटीवी वीडियों का रेज्युलेशन ज्यादा अच्छा नहीं होता लेकिन आजकल इन कैमरों के लेंस और सेंसर में सुधार करके इनकी क्लियरिटी अच्छी की जा रही है| 

फायर अलार्म सिस्टम : किसी भी संस्थान या दूकान को खाली चोरों का ही डर नहीं होता बल्कि और भी कई प्राकृतिक या अप्राकृतिक आपदाओं से भी जान-माल की हानि होने का डर रहता है| ऐसी ही एक आपदा है आग लग जाना, जो कुछ ही समय में सब कुछ स्वाह कर सकती है| आग किसी भी कारण से लग सकती है जैसे गैस का रिसाव से, शॉट सर्किट से, विरोधियों या असामाजिक तत्वों द्वारा, किसी की लापरवाही से और भी कई वजह हो सकती है|

यदि लगते ही उसे देख लिया जाए तो उसपर काबू पाना थोड़ा आसान हो जाता है, लेकिन यदि इसे शुरुआत में देखा ना जा सके या आपकी गैर मौजूदगी आग लगाती है तो उसे फैलने से रोका नहीं जा सकता| ऐसे समय में काम आता है फायर अलार्म और फायर एक्स्टिंगशर सिस्टम | फायर अलार्म सिस्टम के आसपास यदि धुँआ आता है तो यह बज उठता है 

फायर सिक्योरिटी सिस्टम भी दो तरह के होते हैं 1) मैनुअल 2) ऑटोमेटिक| मैनुअल सिस्टम में अलार्म बजने के बाद वहां उपस्थित लोग फायर एक्स्टिंगशर से आग बुझाते हैं वही ऑटोमेटिक सिस्टम में अलार्म के साथ पाइप सिस्टम जो जोड़ा जाता है जो अलार्म के बजते ही स्वत चालू होकर आग को बुझा देता है |  

डोर सिक्योरिटी सिस्टम: यह अवांछित लोगो के प्रवेश से घर और संस्थान को सुरक्षित रखता है | डोर सिक्योरिटी सिस्टम में भी आजकल कई अपडेटेड फीचर आ चुके हैं जैसे आप दरवाजे पर खड़े व्यक्ति से बिना दरवाजा खोले बात कर सकते हैं, दरवाजा खोलने के लिए बायोमैटिक्स सिस्टम का उपयोग कर सकते हैं| अपने मोबाईल से दरवाजे को लॉक-अनलॉक कर सकते हैं आदि |

जीपीएस सिस्टम: स्थिर सम्पतियों की रक्षा तो हम उपरोक्त उपकरणो से कर सकते हैं पर हमारे वाहनों का क्या?  वाहनों और वाहनों में बैठे लोगों की सुरक्षा के लिए हम जीपीएस ट्रेकिंग सिस्टम का उपयोग कर सकते हैं| उदाहरण के लिए आप एक स्कुल संचालित करते हैं तो स्कुल बस में जीपीएस ट्रेकिंग सिस्टम लगवा सकते हैं, जिसका यह फायदा होगा की आपको अपने सिस्टम (कंप्यूटर) या मोबाइल पर उस बस की उपस्थिति की स्थिति पता चल जाएगी| बस में लगा ट्रेकर सेटेलाइट ट्रेसिंग सिस्टम से जुड़ा होता है, जिस कारण ट्रेकर की लाइव लोकेशन में बदलाव करना असंभव जैसा ही है|  

आजकल आकार में छोटे ट्रेकिंग डिवाइस भी उपलब्ध है, जिन्हे आप कारों ही नहीं बाइक में भी इंस्टाल करवा सकते है, जो गाड़ी की लोकेशन के साथ उसकी स्पीड भी दिखा देता है| सबसे महत्वपूर्ण फीचर यह है कि आप इन ट्रेकरों के सॉफ्टवेयर की मदद से गाडी को लॉक भी कर सकते हो|  

और भी कई तरह के सिक्योरिटी सिस्टम है जो किसी भी अवांछित अप्रिय घटनाओं से शैक्षणिक संस्थानों, प्रतिष्ठानों, घर, दफ्तर आदि की सुरक्षा करते है| अनहोनी कभी भी किसी के भी साथ हो सकती है, लेकिन हमारी जरा सी सतर्कता और इन उपकरणों की मदद से हमारी चल/अचल सम्पत्तियों की सुरक्षा हो सकती है| 


कोई टिप्पणी नहीं

Blogger द्वारा संचालित.